वो एक ख़लिश सी

कभी कभी एक शख्स ना ज़िंदगी में पूरी तरह आ रहा होता है न ज़िंदगी से पूरी तरह जा रहा होता है.

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कुछ मर्तबा रिश्ता एक पहेली बन जाता है – समझ नहीं आता कि आप रिश्ते में हैं या नहीं? या सामने वाला रिश्ते में है या नहीं? या कोई ‘रिश्ता’ भी है या नहीं? कभी लगता है कि आप उसके लिए अपनों से ज़्यादा अपने हैं तो कभी किसी अजनबी से ज़्यादा पराए. आप कभी उसकी ‘आदत और ज़रुरत’ लगने लगते हैं तो कभी यूं महसूस होता है जैसे वो हो एक ‘माज़ी या कोई याद’.

अजीब उलझन हो जाती है, जैसे किसी चुभी फांस का सिरा टूट गया हो और वो कभी अंदर महसूस होती हो तो कभी गायब. दिमाग का एक हिस्सा वहीं अटका रहता है, जैसे किराए पर चला गया हो. बिलकुल ग़ालिब के शेर का वो ‘तीर-ए-नीम-कश’ और वही ख़लिश जो उसके जिगर के पार ‘ना’ होने से हुई होगी. बड़ी अलग बेचैनी और अनमनापन है. समझ नहीं आता करें तो क्या करें?   

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अरे! क्या करें मतलब? साफ़ बात करें. ये सब कहें. फैसला लें. तय करें. या फिर…भूलें और आगे बढ़ें.

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There was a time when…

After a point, most relationships tend to turn merely ‘functional’ in nature.     

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The biggest challenge in a relationship is to retain the ‘spark’ that you had at the ‘start’. O! And that’s not easy. After all, everything natural is bound to change, and brain has an innate tendency to ‘take things for granted’ so that it can save its processing power on that front and reallocate it as per need.

But in relationships, this ‘stabilizing’ often leads to stagnancy. The partners become ‘providers’ for each other, or say they get into their respective ‘roles’. And then they have their set routines and rituals, and gradually that’s all that amounts to ‘life’. Sadly, then the distance grows, and emotions recede.

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Invest in retaining freshness in a relationship – stable shouldn’t mean…stale.

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अच्छाई की कीमत!

अच्छा इंसान बने रहना सब के बस की बात नहीं – कीमत चुकानी पड़ती है.

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अच्छा होना आसान होता तो हर कोई अच्छा ही बना रहता ना! कोई भला क्यों चालाक या कमीना हो कर अपने ज़मीर पर बोझ लेता? पर अच्छा होना आसान ही तो नहीं है – जल्दी और ज़्यादा पा लेने के मौके छोड़ना पड़ते हैं, मिल सकने वाली मक़बूलियत को मुल्तवी करना पड़ता है, इल्ज़ाम और नुक़सान सह कर भी ‘सही’ करते रहना पड़ता है.

और तो और, शौक़-ओ-इशरत की हदें और कसौटी तय करनी पड़ती है, मखौल और ताने झेलना पड़ते हैं, गलत समझे जाने का ख़तरा उठाना पड़ता है, और इस सब के बावजूद बिना मदद के मज़बूत बने रहना पड़ता है! पर पता है? फिर भी अच्छे बने रहने की कोशिश कीजिये – क्योंकि एक तो ये उसूलन सही है, और दूसरी वाजिब वजह यह कि…

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“जो जितनी कीमत चुकाता है, वक़्त के साथ…उतना कीमती होता जाता है”.

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Do you know enough?

Sometimes the undeserving one walks away with all the sympathy.    

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In the realm of troubled relationships, it is almost impossible to determine who is actually the victim – the one who shouts in rage, or the other who sobs all the time? The one who complains, or the other who doesn’t want to talk about it? The one who wants to end it, or the other who wants it to continue?

It is such a complex web that what meets the eye seldom shows what ‘is’. There is a lot going behind and beneath – there are old scores settled, there are subtle games played, there are hidden agendas served, and there are scripted stories told. And amid all this, it is hard to know who did what…for what.

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That’s why “Never pass a judgment unless you have known enough”.

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The Disciple!

Discipline is not about dullness, it is about balance.    

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Most people mistakenly associate ‘being disciplined’ with ‘being dull or mechanical’. They think that discipline is about surrendering life to routines & schedules and making it a dry experience devoid of energy, joy or creativity. They think it is about boredom, when in fact, it is the… exact opposite.

Discipline is not only about “everything on time” but also about “time for everything”. It is about taking out time for ‘Me-time and We-time’ as religiously as for work or studying. It is about the all-important ‘moderation’ which makes your happiness more sustainable and creativity more consistent.

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Embrace ‘discipline’ with joy and witness the difference.

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Relationship Status (quo)!

For many people out there, their relationship status actually is… “Somehow holding on”.    

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It is strange how equations change in life. Now you can’t live with ‘what’ you once couldn’t live without. It’s cruelly ridiculous, but you go through it every day. And now you are too invested to leave…too settled to disrupt. There is far more at stake…far too much to simply walk away. So you continue…

You reckon you will somehow manage – at times by bearing…at times by ignoring; with an occasional tiff…or by reminding yourself ‘what if’. And it works! But then…you begin to wonder if it’s all worth it. You know what! There are no binary answers. It’s a long and winding process of finding a solution.

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Commit yourself to that process now, before it is too late for a discovery or a…recovery.

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कल आज कल

जिन मसलों को सुलझाने में आप आज दुखी हैं उनमें से ज़्यादातर आपने ही कल पैदा किये थे.

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इंसान अपने बोये हुए गलत बीजों से दूर भले ही निकल आए, उनसे आई कांटों की फसलें हालात पर सवार हो कर सारे फासले तय करती हुई उसे ढूंढ ही लेती हैं. और जब ऐसा होता है तो इंसान पहले उन फसलों को अपने बीजों से जोड़ने से साफ़ इंकार करता है, फिर याद आने पर कतराना शुरु करता है, और फिर ‘हालात’ का हवाला दे कर पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है.

लेकिन साहब ये ठहरी सख़्तजान कांटों की फसल! और कांटे ना तो नज़रअंदाज़ करने पर मुरझाते हैं, ना सहला कर समझाने की इजाज़त देते हैं, ना मसलने की रिआयत, और ना यूं ही कहीं फेंक देने की सुहूलत. इसलिए आखिर में उनकी चुभन को बर्दाश्त और चुन कर एक-एक से हिसाब-किताब…जिरह-झड़प करना पड़ता है. और इस तरह कल की फसल ‘आज के मोल’ जाती है.

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ध्यान रखिये! कल का आज भोगने वाले ‘हम’ आज कुछ ऐसा ना बोयें जिससे कल भागना पड़े.

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The Final Fun!

Final fun lies in facing your fears.   

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Yup! There’s fun in lazing around with the TV on, or in dancing to the similar beats with the rehearsed (and still weird) moves, or listening to the so-called favorite song that invokes the same memories, or cracking the stale jokes about mundane topics on same pals who retort the same way.

But believe me there is fun also in feeling your heart beating right up to your ears with a stereophonic sound-effect as ‘one more time’ you approach your emotional nemesis – the one that you dread, run away from, feel nervous about, avoid at all costs, get stuck in, and could never look beyond.

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Yup! That’s fun – the fundamental fun! 🙂

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फिर न कहना बताया नहीं!

किसी भी रिश्ते में इतना मत दीजिये कि आप अपने लिए बचे ही ना रहें. 

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जब वफ़ा शिद्दत पर होती है तो इंसान किसी फ़रिश्ते की मानिंद अपना ‘सब’ सामने वाले के सदक़े कर देता है. उस वक़्त तो लगता है कि क्या ना कर जाएं इस शख़्स के लिए! और ये सिर्फ रुमानी रिश्तों की बात नहीं है, जहां भी जज़्बात ज़्यादा जुड़ जाते हैं इंसान अपना वजूद सामने वाले की हस्ती में खो देने को इतना बेचैन हो जाता है कि उसे क्या मिलेगा इसका गणित गायब हो जाता है.

पर शिद्दत भला कब हमेशा रहती है. जो एहसास ऊपर उठता है वो नीचे भी आता है और फिर औसत निकाल कर बीच में कहीं ठहर जाता है. और तब शुरु होता है पाने खोने का ‘हिसाब’, और जब समझ में आता है कि रिश्ते में ‘खुद’ का इतना दे बैठे कि अपने लिए ‘आप’ बचे ही नहीं तो फिर शुरु होती है शिकायत, अफ़्सुर्दगी, नाराज़गी और…धीरे-धीरे थोड़ी-थोड़ी नफरत सी भी.             

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बताइये क्या मिला? जो चाहा था उसका उलटा ही ना? इसीलिए तो…’तवाज़ुन’ रखिये.

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राज़ की बात…

जब किसी से ‘नाराज़’ हो जाएं तो उसके ‘राज़’ ना ज़ाहिर करें – यक़ीं की रुस्वाई होती है. 

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लोग भी बदलते हैं और लोगों के बीच के तअ’ल्लुक़ की तासीर भी. आज जो ‘पास और ख़ास’ हैं उनके बीच ज़िंदगी कब कोई फांस ला के फासला ले आए पता ही नहीं चलता. और फिर जब मोहब्बत में खटास पड़ती है तो असर भी मामूली तो होने से रहा. क़रीब जब रक़ीब बनते हैं तो अच्छे-ख़ासे ही बनते हैं. तो दुश्मनी तो ख़ूब ही निभेगी, पर बस…एक एहतियात रखिएगा.

वो ये कि क़ुरबत के वक़्त में की गईं दिल की सबसे गहरी बातें अब भी निहाँ ही रखिएगा. ऐसा इसलिए कि वो बातें दो दिलों ने उन मख़्सूस लम्हों में की थीं जिनमें आप शक-शुब्हा की दीवार से परे और सोच-समझ की सरहद के पार यक़ीं के महफ़ूज़ मेराज पर आ ठहरे थे. आप उस लम्हे में थे मगर वो लम्हा आप का नहीं था. वो तो किसी दुआ से आपके हिस्से आ गया था.          

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उस दिन जो कहा-सुना वो इस कहा-सुनी से परे रखिएगा – मोहब्बत नहीं तो लिहाज़ की ही खातिर.

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